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श्री सत्य नारायण (Motivational Speaker, Writer & Healer)
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S. N. Prajapati

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I am Motivational speaker, writer, Reiki Trainer, My workshops on this subjects- Mind Programming and Attract money methods workshops . I am proprietor of Urja Enterprises and MD of Urja Publication. My four books are published 1- विचारों की शक्ति और सफलता 2- सफलता आपकी सोच में है 3- समाधान खोजें और सफल हो जाये 4- विचार परिवर्तन और सफलता And fifth book ready to publish.
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लोग आपको सफल होते देखना चाहते हैं।

Penulis : Satya Narayan on Tuesday, 30 July 2013 | 03:09

Tuesday, 30 July 2013

Lucknow :  ’’आप जब यह सोंचते हैं कि आपकी तरक्की से लोगों को ईर्षा होती है तब आप कभी भी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं कर सकते और जब आप यह समझते हैं कि लोग आपको सफल होते देखना चाहते हैं तब आप अवश्य सफल हो जाते हैं।’’

’’सफलता आपकी शवनात्मक सोंच का परिणाम है।’’ लोगों को अपनी सफलता में सहभागी बनाने का इकलौता उपाय है कि आप सम्पूर्ण समाज के लोगों को अपना हितैषी मानकर उनसे प्रेम करे। कभी भी आप यह न सोंचे कि कोई आपकी सफलता के मार्ग में बाधक बन रहा र्है। वास्तव में दूसरों के विषय में जब आप
’’रचनात्मकता के अभाव में सफलता अनिश्चित हो जाती हैं।\" ’’जब आप यह सोंचते हैं कि लोग आपकी सफलता से खुश हैं तब आप सृजनात्मक अवस्था में पहुँच जाते हैं और सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करने लगते हैं।’’ सब अपने हैं कोई पराया नहीं है। जिस क्षण आप ऐसे विचारों को आप अपने मन में पैदा करेंगे उसी क्षण सम्पूर्ण संसार की अच्छी शक्तियाँ जागृत होकर आपके लिए कार्य करना प्रारम्भ कर देंगीं।
सोंचतें हैं कि वे आपके लिए बाधाऐं उत्पन्न कर रहें हैं, तब आपकी ओर नकारात्मक उर्जा आकर्षित होकर आपके कार्यों में अड़चनें पैदा करेंगी क्योंकि आपके चारों ओर जो आभामण्डल फैली हुई है उसे आप सकारात्मक अथवा नकारात्मक उर्जा में अपनी सोंच के अनुसार बदल सकते हैं।

’’जब आप यह सोंचते हैं कि लोग आपकी सफलता से ईर्षा, द्वेष कर रहें हैं तब आप प्रतियोगिता की अवस्था में आ जाते हैं।’’ ऐसा करके आप नकारात्मक लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस प्रकार की उर्जा आपके जीवन में ऐसे ही लोगों को लाकर खड़ा कर देती है। तब उन लोगों से तरह तरह के आलोचनात्मक तर्को को सुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। परिणाम स्वरूप आपका आत्मविश्वास टूटकर बिखर जाता है। हर कोई आपका शत्रु नजर आता है। आप जिधर भी जाते हैं उधर आपको वैसे ही लोग मिलते हैं और कोई आपको दुःखी करने वाली कोई न कोई बात अवश्य कहता है।

’’जब आप यह सोंचते हैं कि लोग आपकी सफलता से खुश हैं तब आप सृजनात्मक अवस्था में पहुँच जाते हैं और सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करने लगते हैं। ’’रचनात्मकता के अभाव में सफलता अनिश्चित हो जाती हैं" जैसे कि आप राष्ट्रप्रेम के कारण विदेशों की नीतियों का विरोध करते हैं तब तुलनात्मक दृस्टिकोंण से प्रतियोगिता की अवस्था में हैं इसलिए आपके मन में घुटन, नफरत, ईर्षा क्रोध के विचार चल रहें हैं अतः आपकी सफलता अनिष्चित हो जाती है।’’ परन्तू जब आप विश्व समाज के कल्याण के विषय में सकारात्मक विचार रखते हैं तब आपको सफल बनाने लिए ब्रहमाण्ड की सारी अच्छी शक्तियाँ आपके साथ आ जायेंगी और आपकी सफलता निश्चित हो जायेगी।
आप बार बार इस भवना को प्रबल बनायें कि विश्व के सारे लोग आपको समृद्वशाली, शक्तिशाली एवं सम्पन्न देखना चाहते हैं जिसमें आपके परिवार के सारे सदस्य एव मित्र, पडोसी, रिश्तेदार शामिल हैं। तब आपके जीवन में अद्भुत चमत्कारिक परिवर्तन होंगे। आपको इस भावना में शुभ एवं प्रेम के विचार को अवश्य ही निवेश करना है अर्थात सब अपने हैं कोई पराया नहीं है। जिस क्षण आप ऐसे विचारों को आप अपने मन में पैदा करेंगे उसी क्षण सम्पूर्ण संसार की अच्छी शक्तियाँ जागृत होकर आपके लिए कार्य करना प्रारम्भ कर देंगीं। आपको मालूम ही नहीं होगा कि आप कब सफल हो गये।

इस प्रयोग को आप अभी से प्रारम्भ कर सकते हैं क्योंकि किसी भी अच्छी चीज की शुरूआत करने के लिए कोई भी आदर्श समय नहीं होतां । इसलिए आप अभी शुरू करें और अभी फायदा पायें। इनके परिणामों से आप हैरान रह जायेंगे।

विश्व के देशों के साथ भी यही नियम काम करता है। जब कोई देश स्वयं को दूसरे देशों से उपर उठाने के लिए उनको हराने या नीचा दिखाने की भावना से कार्य करता है तब उस देश की जनता को अनेकों समस्याओं जैसे महंगाई, घूस, भ्रष्टाचार इत्यादि का सामना करना पडता ही है। अतः यदि अपने देश को समृद्वशाली बनाना चाहते हैं तो दूसरे देशों को अपना शत्रु नहीं मित्र समझें।

’प्रतियोगिता में आप दूसरों को हराने की भावना से काम करते हैं।’ अतः आप वास्तव में स्वयं में हारने की उर्जा भर रहें हें और इसलिए आपको जीतने पर भी वास्तविक खुशी नहीं मिल पाती है क्योंकि आपको जितनी खुशी जीतने में नहीं मिलती उससे ज्यादा खुशी दूसरों के हारने में होती है क्योंकि दूसरों को हराने के लिए आपने खेल में भाग लिया था।

आपके आस-पास कार्य-व्यवहार में यदि नकारात्मक विचारों वाले लोगों की संख्या ज्यादा है तो उनको आपने उत्पन्न किया है। क्योंकि आप यही सोंचते हैं कि लोग आपसे ईर्षा करते हैं, लोग आपको आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते। लेकिन यह सब मात्र आपकी नकारात्मक सोंच है। सच्चाई यह है कि लोग आपको सफल होते देखकर खुश होते हैं और आपको आगे बढने के लिए हर प्रकार की आर्थिक, वैचारिक मद्द भी करते हैं। आप इस विचार को अपने मन में स्थापित कर ली

जिए आप पायेंगे कि आप व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक हर क्षेत्र में सफल हो रहे हैं।
’’जब आप यह सोंचते हैं कि हर कोई आपके साथ है तब आप और आपका समाज विकास कर रहे होते हैं।’’
प्रेरक गुरू एवं लेखक. एस एन प्रजापति
अध्यक्ष. ब्रायन टेरेसी प्रेरक समिति
पता 541 G/19 ग्रीन सिटी नया हैदरगंज
लखनऊ 226003
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सन्देह आपको असफलता के जाल में उलझा देती है


News Imageलखनऊ :  जिस प्रकार मकड़ी अपने ही द्धारा बनाये गये जाल में फँस जाती है। वह उस जाल से जितना ही निकलना चाहती है, उतना ही ज्यादा और उलझती जाती है। उसी प्रकार आपके मन में किसी के प्रति एक नकारात्मक विचार आपको अपना ही शत्रु बना देती है। एक नहीं अपितु अनेकों सगे-सम्बन्धियों के बीच आपको अकेलेपन का अहसास होता रहेगा। क्योंकि आप जहाँ भी रहेंगे आपके साथ आपका सन्देह आपके साथ रहेगा।
’’सन्देह एक ऐसा शत्रु है जो किसी से भी मित्रता नहीं करने देता, अपितु मित्रों को भी शत्रु बना देता है।’’ घर के सदस्यों पर आप किसी

वह मीठे जहर के समान आपके विचारों में फैलता रहता है और एक दिन आपको आपके सभी रिश्तेदारों से अलग कर देता है। मात्र एक ऐसी बात जिसका न कोई सिर है और न ही कोई पैर है। फिर भी वह आपको आपके हाथ-पैरों से दौड़ा-दौड़ा कर थका देता है।
न किसी बात को लेकर अविश्वास करते रहते हैं। एक-दूसरे का चेहरा देखकर यह अन्दाजा लगाते रहेंगे कि वह आपके विषय में क्या सोंच रहा है? बाहर के लोंगो के विषय में भी आप यही सोंचते रहते हैं। आपका मन दूसरों में ही लगा रहता है और अपने विषय में सोंचकर हीन भावना के शिकार हो जाते हैं।
वास्तव में सन्देह आपके भीतर जन्म लेने वाला एक ऐसा भूत है जो कभी दिखाई नहीं देता। लेकिन वह आपके विचारों को खोंखला करने का कार्य लगातार करता रहता है और आपके जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। दिन-रात आपको चैन नहीं लेने देता है। सोने-जागने एवं खाने-पीने इत्यादि सभी जगहों पर वह आपके अन्दर छिपकर चोर की भाँति चुपचाप बैठा रहता है।
यह ठीक उस डायबिटीज (शूगर) वाली बीमारी की तरह है जो शरीर पर कब्जा करने के बाद शरीर के सम्पूर्ण अंगों को अपने कब्जे में लेकर उन समस्त पोषक तत्वों के स्वादों से व्यक्ति को वंचित कर देती है। व्यक्ति उन मीठे फलों को खाना तो चाहता है लेकिन अपने मन को अपनी मुट्ठी में दबाकर जीवन भर रखे रहता है। ठीक उसी प्रकार व्यक्ति उस मकड़ी के जाले की भाँति नकारात्मक विचारों में उलझा रह जाता है। परिणामस्वरूप आपके जीवन में अनेकों समस्याओं का अम्बार लग जाता है और आप अपने ही जीवन से परेशान, निराश हो जाते हैं।
जब उस पर सकारात्मक सोंच रूपी वर्षा की बूँदें लगातार गिरने लगती हैं तब वह उसी प्रकार धीरें-धीरे साफ होने लगता है जिस प्रकार गंदे पानी से भरे गिलास में लगातार साफ पानी गिराते रहने से गिलास का गन्दा बाहर निकल जाता है और उसमें साफ पानी भरा रह जाता हैं।
वह मीठे जहर के समान आपके विचारों में फैलता रहता है और एक दिन आपको आपके सभी रिश्तेदारों से अलग कर देता है। मात्र एक ऐसी बात जिसका न कोई सिर है और न ही कोई पैर है। फिर भी वह आपको आपके हाथ-पैरों से दौड़ा-दौड़ा कर थका देता है। यह जहर आपके दिमाग को खा जाता है। जिसमें सब कुछ खाली रह जाता है। आपके मन में जब यह विचार आता है कि आपके अपने ही आपके साथ छल, कपट एवं धोखा कर रहें हैं। तब आपको श्रीकृष्ण के बताये हुए श्लोक के अर्थ को समझना है कि जो हुआ सो अच्छा हुआ, जो होगा वह भी अच्छा होगा। क्योकि बुरा कुछ होता ही नहीं है।
जैसा कि महात्मा गाँधी ने कहा है कि ’’त्याग हृदय की वृत्ति है।’’
एस.एन. प्रजापतिं
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